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सोमवार, 4 अक्टूबर 2010

मेरा सलाम उस अमर शहीद को

सारा देश आज एक सपूत को श्रधांजलि दे रहा है ,
सोचा मै कैसे मै अपना श्रधा सुमन अर्पित करू
क्या मै इसके योग्य हूँ ,
या फिर मै भी सफ़ेद जानवर बन जाऊ
जाकर इनके समाधि पर एक घडियाली आंसू बहाऊ
फिर जनता और मीडिया में जय हिंद का नारा लगाऊ
अजीब सी कसमकस है अंतर्मन में
जुबान बोलना चाहती है जय हिंद
लेकिन मन कहता है क्या इसके लायक तू है
जा पहले सोच तुने कब किया था समाज और देश का भला
क्या तू कभी बिना रिश्वत दिए हुए अपना काम किया है
क्या किसी जगह अपराध करते हुए किसी को रोका है
क्या कभी घूसखोर नेता या कर्मचारी को थप्पड़ मारा है
मैंने अपना अवलोकन किया
हर तरफ से नकारात्मक उत्तर मिला
फिर मन ने बोला तू इस लायक नहीं की
इस सपूत को श्रधान्जली दे सके
जा पहले इस योग्य बन कर आ
मै अपमानित सा लूटा हुआ , थका हुआ
बिना श्रधासुमन अर्पित किये हुए चला आया
सोचा पहले अपने आप को इस काबिल बनाऊंगा
फिर आकर एक दिन बड़े गर्व से अपना श्रधा सुमन चढाऊंगा
और फिर बोलूँगा जय हिंद , जय हिंद

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