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रविवार, 3 अक्टूबर 2010

अमन चैन, भाई चारे का, फिर से खिला चमन !!!

हर चौराहे पे फौज खड़ी थी , बन्दूको की नाल तनी थी ,
कही चीखता सन्नाटा था , कही शांति मौन खड़ी थी |

देश और दुनिया के लिए था , ये सबसे बड़ा विवाद,
मूर्ख बनी थी देश की जनता , नेताओं ने काटा खूब बवाल |

आ गया फिर फैसला , फिर आयी नयी सुबह,
अमन चैन, भाई चारे का, फिर से खिला चमन |

राम भी खुश रहीम भी खुश है , मानवता भी ईठलाय रही,
अमन चैन के दुश्मनों पे , बिजली एक गिराय रही |

कुछ तो नेता पीट पीट के, छाती रहे चिल्लाय ,
कोई कहता न्याय हुआ है, कोई कहता है अन्याय |

मंदिर , मस्जिद जनता जाती , नेता जाते अपने धाम,
कैसे इनकी जेब भरे , करते रहते एक ही काम |

ऐ सत्ता के दलालों , सुन लो जनता की हुंकार ,
बहुत सुन लिया तुमको मैंने , अब नहीं चलेगा अत्याचार |

ऊर्जा मूल्यवान है अपनी , इसको न हम व्यर्थ गवाएं ,
मिले जहाँ रोजी रोटी , ऐसा हम एक देश बनाए |

मिटे गरीबी भूख सभी की , सभी हो साधन संपन्न ,
जिन्होंने चुसे खून देश के , उनको अब तो करो विपन्न |

चिरकुट नेता कहते हमसे , जैसी जनता वैसे हम ,
दिखा दो दर्पण में चेहरा , कैसे वो है कैसे हम |



अजय त्रिपाठी

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