Ajay Tripathi
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शनिवार, 27 अक्टूबर 2012
मीठी यादे
जिन्दगी में क्या है खट्टे मीठे यादों के सिवा
कुछ गुजरे हुए पल , कुछ खुशनुमा लम्हा
कुछ अपनों का साथ , कुछ बिछड़े हुए यार
यही है जिंदगी जो पल दो पल की मोहताज है
अपनों के लिए , जो बिखरी हुयी यादो को
समेटते हुए , याद करते हुए चलती चली जा रही है
अजय 'विद्रोही'
जीवन पथ
अपनी तन्हाईयो से लड़ते लड़ते,
ना जाने कहाँ निकल आया हूँ मै |
प्यार का घरौंदा बनाया था कभी मैंने,
उसे ना जाने कहाँ छोड़ आया हूँ मैं |
सफ़र में ना जाने कितने हमसफ़र मिले,
किसी को भूल किसी को याद करता आया हूँ मै |
ये जीवन पथ है इसपे अकेला ही चलना होगा,
इसी सबक के साथ दूर चला आया हूँ मै |
अजय ' विद्रोही'
जिन्दगी को बहुत करीब से देखा है ,
जिन्दगी को बहुत करीब से देखा है ,
बुनते हुए ख्वाबो में रात गुज़रते देखा है ,
सपनों की दुनिया में दूर तक जाकर,
फिर अपने आप को लौटते हुए देखा है ;
बहुत दूर चलता गया जीवन की राहो में ,
अंगारों पे जलते हुए पावो को देखा है ;
जिन्हें अपना बनाया जिन्दगी की राह में ,
हमने उन्हें लूटते हुए देखा है ;
कब वो मिले कब बिछड़ गए इस राह में ,
मैंने उस बेवफा की वफाई को देखा है ;
रविवार, 17 अप्रैल 2011
" हम तो भये कोतवाल अब डर काहे का "|
बहुत दिनों से इस देश में अँधेरा व्याप्त था | सभी तरफ आराजकता का माहौल है , जनमानस को हमेशा राजनितिक दलों द्वारा छला गया लेकिन जब एक रोशनी जगमगाई , जब एक सवेरा हुआ तब तमाम राजनितिक दलों के होश उड़ गए है | अब वो कमियां निकालने में जुट गए है , कारण यह की वो इस आन्दोलन की सफलता से डर गए है | उन्हें लगता है कैसे इतने लोग अपने आप से इकठ्ठा हो गए बिना कुछ खर्च किये ही | उन्हें आश्चर्य हो रहा है क्योंकि वो अपनी सभाओं में लोगो लाने के लिए पैसे खर्च करते है प्रलोभन देते है बस , वाहन आदि की व्यवस्था करते है | लेकिन यहाँ तो ऐसा कुछ नहीं हुआ | सब लोग अपने वाहन से आये वो भी परिवार के साथ , बच्चे , जवान सभी शामिल हुए स्वेक्षा से |इनके तरीके से आन्दोलन के सफलता का मतलब ये है है की दूकाने लुटे , वाहन जले , कार्यालय न चले , व्यापार ठप हो जाए , बीमार मर जाए आदि आदि लेकिन इस आन्दोलन में ऐसा कुछ नहीं हुआ , दुकाने भी चली वाहन भी चला और कार्यालयों में काम भी हुआ और कर्मी आन्दोलन में शामिल भी हुए | दूसरी समस्या कैसे हम जुगाड़ करके हम अपनी पार्टी के सभाओं के लिए फिल्म स्टार और प्रसिद्द हस्तियों को बुलाते है ताकि लोग आये उन्हें हम कितने प्यार से सम्मान के साथ खिलाते पिलाते है फिर मंच तक लाते है फिर भी लोग उस अनुपात में नहीं आते है | यहाँ फ़िल्मी हस्तियाँ भी आयी प्रसिध्ध लोग भी आये बिना किसी खर्च के और खुशामद के जो नहीं शामिल हुए वो जनता से अपील किये की अपना समर्थन दे इस आन्दोलन को जो लोग भी आये उन्हें किसी प्रकार से विशेष दर्ज़ा नहीं दिया गया और वो भी एक आम नागरिक की तरह इस आन्दोलन में शामिल हुए |यहाँ तो हमें मत पाने के लिए या इकठ्ठा करने के लिए लोगो को जाति और धर्म के नाम पर बांटना पड़ता है , लेकिन इस आन्दोलन में किसी ने न किसी के जाति पूछी और ना ही धरम, सभी समुदाय के लोग शामिल हुए बिना बहलाए ,फुसलाये और बरगलाए |
अब भी उनको शक है की मांगे मान ली गयी है लेकिन पूरी नहीं होंगी कारण यह है की भाई आप आन्दोलन चलाये अछि तरह से वो ठीक है लेकिन उसका फैसला तो हम ही करेंगे न अंत में हमारे पास ही आओगे क्योंकि उन्हें पता है की हम राजनितिक दल कितने घाघ है कितनी घोसडाये हमने अपने चुनावी मंच से की है , चुनाव में हमने कितनी मांगो को माना है , लेकिन क्या कुछ हुआ है | येहाँ तो ये है की जनता ने श्री अन्ना जी के नेतृत्वा में मांगे जबरदस्ती मंगवा ली और साथ साथ में धमकी भी दिया की लड़ाई अभी बाकी है और जब तक आप हमारी मांगो को पूरा नहीं करते हम आपको चैन से बैठने नहीं देंगे और साथ में ये भी बोला की तुम लोगो पर विश्वाश नहीं है हम भी उसमे शामिल होकर काम काज क्या हो रहा है देखेंगे |उनके सारे सूत्र ध्वस्त हो गए देखते देखते | उनका मान मर्दन हो गया सो सोचते थे की " हम तो भये कोतवाल अब डर काहे का "|
राजनितिक दल अवसरवादिता के शिकार है . भ्रस्ट है लेकिन उलहाना ये देते है की हमें जनता ने चुना है , अगर हम भ्रस्ट है तो इसकी जिम्मेदार जनता है क्योंकि वो भी भ्रस्ट है | वो भी अपने छोटे मोटे कामो के लिए रिश्वत देती है | इस नाते इनको भी घोटाला करने का अधिकार है |
यह आन्दोलन राजनितिक दलों के लिए एक सबक है | कैसे एक साधारण आदमी की आवाज़ पर पूरा देश एकत्रित हो गया | क्या किसी राजनितिक दल के पास ऐसा कोई व्यक्ति है जिसके एक आवाज पर पूरा देश स्वेक्षा से आ जाये ? जब हम आप या स्वयं ये राजनितिक दल खंगालेंगे तो उत्तर नहीं में ही मिलेगा | कारण राजनितिक दलों में सभी अपने निजी स्वार्थ में मशगूल है उनको जनता की समस्या से क्या लेना देना | उन्हें सिर्फ और सिर्फ सत्ता चाहिए ताकि उसका उपभोग अपने लिए और अपने पीढियों के लिए करे | येही कारण है सभी पार्टियों में लोकतंत्र ख़तम हो रहा है और परिवारवाद पनप रहा है |
जनता सब देख रही थी उसे एक नेतृत्वा की तलाश थी और जब मिला तो उसकी टंकार से सारे राजनितिक दल काँप उठे | उन्हें अन्दर ही अन्दर जनशक्ति का एहसास हो गया है और वो कुंठित हो चुके है |
येही कारण है अब वो इस आन्दोलन में कमियां निकालने में जुट गए है सार्वजानिक मंच पे व्यंग वाण चला रहे है |
ये लड़ाई अभी ख़तम नहीं हुयी ये महज़ शुरुआत है अब इस देश में एक ही अन्ना नहीं है हज़ारो अन्ना पैदा हो चुके है जो इस क्रांति के मशाल को तब तक नहीं बुझाने देंगे जबतक की उन्हें उनका लक्ष्य नहीं मिल जाता |
अतः हे राजनीतिज्ञों अब भी वक्त है संभल जाओ जनता के शासक बनाने की जगह उनके सेवक बनने की कोशिश करो |
आम जनता ,
अब भी उनको शक है की मांगे मान ली गयी है लेकिन पूरी नहीं होंगी कारण यह है की भाई आप आन्दोलन चलाये अछि तरह से वो ठीक है लेकिन उसका फैसला तो हम ही करेंगे न अंत में हमारे पास ही आओगे क्योंकि उन्हें पता है की हम राजनितिक दल कितने घाघ है कितनी घोसडाये हमने अपने चुनावी मंच से की है , चुनाव में हमने कितनी मांगो को माना है , लेकिन क्या कुछ हुआ है | येहाँ तो ये है की जनता ने श्री अन्ना जी के नेतृत्वा में मांगे जबरदस्ती मंगवा ली और साथ साथ में धमकी भी दिया की लड़ाई अभी बाकी है और जब तक आप हमारी मांगो को पूरा नहीं करते हम आपको चैन से बैठने नहीं देंगे और साथ में ये भी बोला की तुम लोगो पर विश्वाश नहीं है हम भी उसमे शामिल होकर काम काज क्या हो रहा है देखेंगे |उनके सारे सूत्र ध्वस्त हो गए देखते देखते | उनका मान मर्दन हो गया सो सोचते थे की " हम तो भये कोतवाल अब डर काहे का "|
राजनितिक दल अवसरवादिता के शिकार है . भ्रस्ट है लेकिन उलहाना ये देते है की हमें जनता ने चुना है , अगर हम भ्रस्ट है तो इसकी जिम्मेदार जनता है क्योंकि वो भी भ्रस्ट है | वो भी अपने छोटे मोटे कामो के लिए रिश्वत देती है | इस नाते इनको भी घोटाला करने का अधिकार है |
यह आन्दोलन राजनितिक दलों के लिए एक सबक है | कैसे एक साधारण आदमी की आवाज़ पर पूरा देश एकत्रित हो गया | क्या किसी राजनितिक दल के पास ऐसा कोई व्यक्ति है जिसके एक आवाज पर पूरा देश स्वेक्षा से आ जाये ? जब हम आप या स्वयं ये राजनितिक दल खंगालेंगे तो उत्तर नहीं में ही मिलेगा | कारण राजनितिक दलों में सभी अपने निजी स्वार्थ में मशगूल है उनको जनता की समस्या से क्या लेना देना | उन्हें सिर्फ और सिर्फ सत्ता चाहिए ताकि उसका उपभोग अपने लिए और अपने पीढियों के लिए करे | येही कारण है सभी पार्टियों में लोकतंत्र ख़तम हो रहा है और परिवारवाद पनप रहा है |
जनता सब देख रही थी उसे एक नेतृत्वा की तलाश थी और जब मिला तो उसकी टंकार से सारे राजनितिक दल काँप उठे | उन्हें अन्दर ही अन्दर जनशक्ति का एहसास हो गया है और वो कुंठित हो चुके है |
येही कारण है अब वो इस आन्दोलन में कमियां निकालने में जुट गए है सार्वजानिक मंच पे व्यंग वाण चला रहे है |
ये लड़ाई अभी ख़तम नहीं हुयी ये महज़ शुरुआत है अब इस देश में एक ही अन्ना नहीं है हज़ारो अन्ना पैदा हो चुके है जो इस क्रांति के मशाल को तब तक नहीं बुझाने देंगे जबतक की उन्हें उनका लक्ष्य नहीं मिल जाता |
अतः हे राजनीतिज्ञों अब भी वक्त है संभल जाओ जनता के शासक बनाने की जगह उनके सेवक बनने की कोशिश करो |
आम जनता ,
गुरुवार, 17 फ़रवरी 2011
देश तुम्हारे साथ खड़ा है, कर लो कप को वाहुपाश

वीरू भीम की गदा चलेगी, दुश्मन धुल को चाटेगा ;
अर्जुन के तीरों की तरह , हर शोट सचिन भी साधेगा;
युधिस्ठिर सा धैर्य रखेगा , धोनी अपने चहरे पे ,
हर चक्रव्यूह को तोड़ेगा , कोहली अपने बल्ले से ;
कृष्ण के जैसा कर्स्टन अपना ,चक्रव्यूह बनाएगा
दुश्मन कितना ताकतवर हो ,फिर भी वो फंस जाएगा ;
महारथी भज्जी के तीरों से , दुश्मन मारा जाएगा
श्रीसंथ के गोलों से , हर कोई गच्चा खायेगा ;
गौतम का जब दंड चलेगा ,पठान मुगदर भान्जेगा ,
युवी के टंकारो से , दुश्मन थर थर काँपेगा ;
रैना जैसा होनहार धनुर्धर , हर तीर निशाने मारेगा ,
पीसी के हर गूगली पर , सब चक्कर खाकर नाचेगा ;
है जोश जूनून हमारे मन में , सेना करेगी की शत्रु संघार ,
खुशियों से इस महासमर का, अंत करेगी टीम महान ;
हिम्मत धैर्य से काम बश लेना , मन में कर लो ये विश्वाश ,
देश तुम्हारे साथ खड़ा है, कर लो कप को वाहुपाश ;
सोमवार, 4 अक्टूबर 2010
मेरा सलाम उस अमर शहीद को
सारा देश आज एक सपूत को श्रधांजलि दे रहा है ,
सोचा मै कैसे मै अपना श्रधा सुमन अर्पित करू
क्या मै इसके योग्य हूँ ,
या फिर मै भी सफ़ेद जानवर बन जाऊ
जाकर इनके समाधि पर एक घडियाली आंसू बहाऊ
फिर जनता और मीडिया में जय हिंद का नारा लगाऊ
अजीब सी कसमकस है अंतर्मन में
जुबान बोलना चाहती है जय हिंद
लेकिन मन कहता है क्या इसके लायक तू है
जा पहले सोच तुने कब किया था समाज और देश का भला
क्या तू कभी बिना रिश्वत दिए हुए अपना काम किया है
क्या किसी जगह अपराध करते हुए किसी को रोका है
क्या कभी घूसखोर नेता या कर्मचारी को थप्पड़ मारा है
मैंने अपना अवलोकन किया
हर तरफ से नकारात्मक उत्तर मिला
फिर मन ने बोला तू इस लायक नहीं की
इस सपूत को श्रधान्जली दे सके
जा पहले इस योग्य बन कर आ
मै अपमानित सा लूटा हुआ , थका हुआ
बिना श्रधासुमन अर्पित किये हुए चला आया
सोचा पहले अपने आप को इस काबिल बनाऊंगा
फिर आकर एक दिन बड़े गर्व से अपना श्रधा सुमन चढाऊंगा
और फिर बोलूँगा जय हिंद , जय हिंद
सोचा मै कैसे मै अपना श्रधा सुमन अर्पित करू
क्या मै इसके योग्य हूँ ,
या फिर मै भी सफ़ेद जानवर बन जाऊ
जाकर इनके समाधि पर एक घडियाली आंसू बहाऊ
फिर जनता और मीडिया में जय हिंद का नारा लगाऊ
अजीब सी कसमकस है अंतर्मन में
जुबान बोलना चाहती है जय हिंद
लेकिन मन कहता है क्या इसके लायक तू है
जा पहले सोच तुने कब किया था समाज और देश का भला
क्या तू कभी बिना रिश्वत दिए हुए अपना काम किया है
क्या किसी जगह अपराध करते हुए किसी को रोका है
क्या कभी घूसखोर नेता या कर्मचारी को थप्पड़ मारा है
मैंने अपना अवलोकन किया
हर तरफ से नकारात्मक उत्तर मिला
फिर मन ने बोला तू इस लायक नहीं की
इस सपूत को श्रधान्जली दे सके
जा पहले इस योग्य बन कर आ
मै अपमानित सा लूटा हुआ , थका हुआ
बिना श्रधासुमन अर्पित किये हुए चला आया
सोचा पहले अपने आप को इस काबिल बनाऊंगा
फिर आकर एक दिन बड़े गर्व से अपना श्रधा सुमन चढाऊंगा
और फिर बोलूँगा जय हिंद , जय हिंद
रविवार, 3 अक्टूबर 2010
अमन चैन, भाई चारे का, फिर से खिला चमन !!!
हर चौराहे पे फौज खड़ी थी , बन्दूको की नाल तनी थी ,
कही चीखता सन्नाटा था , कही शांति मौन खड़ी थी |
देश और दुनिया के लिए था , ये सबसे बड़ा विवाद,
मूर्ख बनी थी देश की जनता , नेताओं ने काटा खूब बवाल |
आ गया फिर फैसला , फिर आयी नयी सुबह,
अमन चैन, भाई चारे का, फिर से खिला चमन |
राम भी खुश रहीम भी खुश है , मानवता भी ईठलाय रही,
अमन चैन के दुश्मनों पे , बिजली एक गिराय रही |
कुछ तो नेता पीट पीट के, छाती रहे चिल्लाय ,
कोई कहता न्याय हुआ है, कोई कहता है अन्याय |
मंदिर , मस्जिद जनता जाती , नेता जाते अपने धाम,
कैसे इनकी जेब भरे , करते रहते एक ही काम |
ऐ सत्ता के दलालों , सुन लो जनता की हुंकार ,
बहुत सुन लिया तुमको मैंने , अब नहीं चलेगा अत्याचार |
ऊर्जा मूल्यवान है अपनी , इसको न हम व्यर्थ गवाएं ,
मिले जहाँ रोजी रोटी , ऐसा हम एक देश बनाए |
मिटे गरीबी भूख सभी की , सभी हो साधन संपन्न ,
जिन्होंने चुसे खून देश के , उनको अब तो करो विपन्न |
चिरकुट नेता कहते हमसे , जैसी जनता वैसे हम ,
दिखा दो दर्पण में चेहरा , कैसे वो है कैसे हम |
अजय त्रिपाठी
कही चीखता सन्नाटा था , कही शांति मौन खड़ी थी |
देश और दुनिया के लिए था , ये सबसे बड़ा विवाद,
मूर्ख बनी थी देश की जनता , नेताओं ने काटा खूब बवाल |
आ गया फिर फैसला , फिर आयी नयी सुबह,
अमन चैन, भाई चारे का, फिर से खिला चमन |
राम भी खुश रहीम भी खुश है , मानवता भी ईठलाय रही,
अमन चैन के दुश्मनों पे , बिजली एक गिराय रही |
कुछ तो नेता पीट पीट के, छाती रहे चिल्लाय ,
कोई कहता न्याय हुआ है, कोई कहता है अन्याय |
मंदिर , मस्जिद जनता जाती , नेता जाते अपने धाम,
कैसे इनकी जेब भरे , करते रहते एक ही काम |
ऐ सत्ता के दलालों , सुन लो जनता की हुंकार ,
बहुत सुन लिया तुमको मैंने , अब नहीं चलेगा अत्याचार |
ऊर्जा मूल्यवान है अपनी , इसको न हम व्यर्थ गवाएं ,
मिले जहाँ रोजी रोटी , ऐसा हम एक देश बनाए |
मिटे गरीबी भूख सभी की , सभी हो साधन संपन्न ,
जिन्होंने चुसे खून देश के , उनको अब तो करो विपन्न |
चिरकुट नेता कहते हमसे , जैसी जनता वैसे हम ,
दिखा दो दर्पण में चेहरा , कैसे वो है कैसे हम |
अजय त्रिपाठी
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