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रविवार, 3 अक्टूबर 2010

तन्हाईयो के साथ

जब संध्या ढलती है
सूरज की लालिमा मद्धम पड़ती है
परिंदों के चहचाहट से एक संगीत सा निकलता है
तभी ना जाने कौन मन के अन्तस्थल में दस्तक देता है
लगता जैसे वो यही कही आस पास है
अपनी प्यार भरी मुस्कान के साथ
आँचल में लिए हुए झिलमिल चांदनी
वो चली आ रही है चाँद के साथ
तभी फ़ोन की घंटी बजती है
तोड़ देती है मेरी तन्द्रा को
एक बार फिर छोड़ जाती है ये रात
मुझे तन्हाईयो के साथ

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