कुल पेज दृश्य

सोमवार, 4 अक्टूबर 2010

मेरा सलाम उस अमर शहीद को

सारा देश आज एक सपूत को श्रधांजलि दे रहा है ,
सोचा मै कैसे मै अपना श्रधा सुमन अर्पित करू
क्या मै इसके योग्य हूँ ,
या फिर मै भी सफ़ेद जानवर बन जाऊ
जाकर इनके समाधि पर एक घडियाली आंसू बहाऊ
फिर जनता और मीडिया में जय हिंद का नारा लगाऊ
अजीब सी कसमकस है अंतर्मन में
जुबान बोलना चाहती है जय हिंद
लेकिन मन कहता है क्या इसके लायक तू है
जा पहले सोच तुने कब किया था समाज और देश का भला
क्या तू कभी बिना रिश्वत दिए हुए अपना काम किया है
क्या किसी जगह अपराध करते हुए किसी को रोका है
क्या कभी घूसखोर नेता या कर्मचारी को थप्पड़ मारा है
मैंने अपना अवलोकन किया
हर तरफ से नकारात्मक उत्तर मिला
फिर मन ने बोला तू इस लायक नहीं की
इस सपूत को श्रधान्जली दे सके
जा पहले इस योग्य बन कर आ
मै अपमानित सा लूटा हुआ , थका हुआ
बिना श्रधासुमन अर्पित किये हुए चला आया
सोचा पहले अपने आप को इस काबिल बनाऊंगा
फिर आकर एक दिन बड़े गर्व से अपना श्रधा सुमन चढाऊंगा
और फिर बोलूँगा जय हिंद , जय हिंद

रविवार, 3 अक्टूबर 2010

अमन चैन, भाई चारे का, फिर से खिला चमन !!!

हर चौराहे पे फौज खड़ी थी , बन्दूको की नाल तनी थी ,
कही चीखता सन्नाटा था , कही शांति मौन खड़ी थी |

देश और दुनिया के लिए था , ये सबसे बड़ा विवाद,
मूर्ख बनी थी देश की जनता , नेताओं ने काटा खूब बवाल |

आ गया फिर फैसला , फिर आयी नयी सुबह,
अमन चैन, भाई चारे का, फिर से खिला चमन |

राम भी खुश रहीम भी खुश है , मानवता भी ईठलाय रही,
अमन चैन के दुश्मनों पे , बिजली एक गिराय रही |

कुछ तो नेता पीट पीट के, छाती रहे चिल्लाय ,
कोई कहता न्याय हुआ है, कोई कहता है अन्याय |

मंदिर , मस्जिद जनता जाती , नेता जाते अपने धाम,
कैसे इनकी जेब भरे , करते रहते एक ही काम |

ऐ सत्ता के दलालों , सुन लो जनता की हुंकार ,
बहुत सुन लिया तुमको मैंने , अब नहीं चलेगा अत्याचार |

ऊर्जा मूल्यवान है अपनी , इसको न हम व्यर्थ गवाएं ,
मिले जहाँ रोजी रोटी , ऐसा हम एक देश बनाए |

मिटे गरीबी भूख सभी की , सभी हो साधन संपन्न ,
जिन्होंने चुसे खून देश के , उनको अब तो करो विपन्न |

चिरकुट नेता कहते हमसे , जैसी जनता वैसे हम ,
दिखा दो दर्पण में चेहरा , कैसे वो है कैसे हम |



अजय त्रिपाठी

तन्हाईयो के साथ

जब संध्या ढलती है
सूरज की लालिमा मद्धम पड़ती है
परिंदों के चहचाहट से एक संगीत सा निकलता है
तभी ना जाने कौन मन के अन्तस्थल में दस्तक देता है
लगता जैसे वो यही कही आस पास है
अपनी प्यार भरी मुस्कान के साथ
आँचल में लिए हुए झिलमिल चांदनी
वो चली आ रही है चाँद के साथ
तभी फ़ोन की घंटी बजती है
तोड़ देती है मेरी तन्द्रा को
एक बार फिर छोड़ जाती है ये रात
मुझे तन्हाईयो के साथ